चार्वाक दर्शन घोर नास्तिक एवं भौतिक वादी दर्शन है। इसका मानना है कि न तो कोई ईश्वर है न ही आत्मा। बन्धन और मोक्ष की कल्पना भी निरर्थक है। यह शरीर ही आत्मा है और शरीर का विनाश ही मोक्ष क्योंकि शरीर का नाश होते ही सभी दुखों का नाश हो जाता है। इस जीवन के बाद कोई दूसरा जन्म नहीं होता, कोई स्वर्ग नरक नहीं होता। जीवन का उद्देश्य है सुखों का भोग करना।
जब तक जियों सुख से जिओं, कर्ज लेकर भी जिओं (यानी मौज-मस्ती करो)। एक दिन यह शरीर भस्म हो जायेगा फिर पुन: लौट कर कहाँ आना है। यानी पुनर्जन्म नहीं होगा।
इस प्रकार चार्वाक दर्शन तो जीवित रहते दुखों से पूर्ण छुटकारा या पूर्ण विनाश सम्भव ही नहीं मानता। जब तक जीवन है सुख दुख लगे ही रहेंगे। दुख के भय से सुख का भी त्याग कर देना यानी मोक्ष की कल्पना में तपस्या आदि करना मूर्खता है
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जीवन के चार पुरुषाथोर्ं में से चार्वाक दर्शन केवल दो ही पुरुषार्थ को मान्यता देता है- अर्थ और काम। वह धर्म और मोक्ष को नहीं मानता। इसलिए चार्वाक दर्शन में मोक्ष एवं मोक्ष मार्ग पर विचार करना निरर्थक है।
चार्वाक का विचार न तो दार्शनिक दृष्टि से उपयुक्त है न ही व्यावहारिक सामाजिक दृष्टिकोण से। यदि व्यक्ति अपने निहित सुख तक ही सोचे तो ऐसे घोर स्वार्थी समाज में किसका भला हो सकता है? आज समाज में बढ़ रहे अपराध बलात्कार, भ्रष्टाचार घोटाले जैसी घटनाएं नैतिक मूल्यों के हृास का ही परिणाम है जिसका समर्थन चार्वाक विचार धारा से होता है। जबकि मोक्ष या कैवल्य के आदर्श का मूल आधार ही नैतिकता है। योग का प्रारम्भिक चरण ही यम-नियम का पालन है। यही कारण है कि मोक्ष को मानने वाले सभी दर्शन सदाचार पर बल देते हैं।
चार्वाक के अतिरक्ति अन्य सभी भारतीय दर्शनों में कैवल्य या मोक्ष को जीवन का परम पुरुषार्थ मानते हुए इसे प्राप्त करने के उपाय बताये गये हैं और इस हेतु किसी न किसी रूप में योग साधना पर बल देते है।
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1 टिप्पणियाँ
बहुत अच्छा आर्टिकल है और लिखते रहिये
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